अलार्म बजता है। आप आँखें खोलते हैं, और बिस्तर से उठने का मन नहीं करता। दिमाग में आज की ‘To-Do List’ घूमने लगती है—बॉस की मीटिंग, क्लाइंट की डेडलाइन, पेंडिंग ईमेल्स, और वो प्रेजेंटेशन जो अभी तक तैयार नहीं है। छाती में एक अजीब सा भारीपन महसूस होता है। ऐसा लगता है जैसे किसी ने बहुत बड़ा पत्थर रख दिया हो।
अगर यह कहानी आपकी है, तो दोस्त, आप अकेले नहीं हैं। इसे ही Work Pressure कहते हैं। और आजकल यह सर्दी-जुकाम की तरह कॉमन हो गया है।
कॉर्पोरेट की दुनिया में “तनाव” (Stress) को एक मेडल की तरह देखा जाता है। “अरे भाई, मैं तो 14 घंटे काम करता हूँ!” “मुझे तो लंच करने का भी टाइम नहीं मिलता।” लोग इसे शान से बताते हैं। लेकिन सच यह है कि यह शान की बात नहीं है। यह खतरे की घंटी है।
अगर आप ऑफिस से घर आने के बाद भी ऑफिस के बारे में सोच रहे हैं, अगर आपको छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा आ रहा है, या अगर रात को नींद नहीं आ रही है, तो समझ लीजिये कि पानी सिर से ऊपर जा रहा है।
नौकरी ज़रूरी है, पैसा ज़रूरी है, लेकिन आपकी जान से ज़्यादा नहीं। तो चलिए, आज बात करते हैं कि इस ‘वर्क प्रेशर’ के गुब्बारे की हवा कैसे निकाली जाए, ताकि आप काम भी करें और ज़िंदगी भी जिएं।

1. क्या यह ‘प्रेशर’ असली है या ‘काल्पनिक’?
सबसे पहले रुकें और गहरी सांस लें। आधे से ज़्यादा स्ट्रेस हमारे दिमाग की उपज होता है। हम सोचते हैं—“अगर यह काम आज नहीं हुआ तो प्रलय आ जाएगी।”
खुद से एक सवाल पूछें: “अगर यह काम कल हुआ, तो क्या कोई मर जाएगा?” (अगर आप डॉक्टर या फायरफाइटर नहीं हैं, तो जवाब है—नहीं, कोई नहीं मरेगा।)
हम अक्सर हर काम को “Urgent” मान लेते हैं।
- ईमेल का रिप्लाई करना? Urgent.
- मीटिंग अटेंड करना? Urgent.
- रिपोर्ट बनाना? Urgent.
जब सब कुछ ‘अर्जेंट’ होता है, तो कुछ भी ‘इम्पॉर्टन्ट’ नहीं बचता। अपने काम को दो हिस्सों में बांटें:
- जो आज ही करना है (Do it now): इसके बिना काम रुक जाएगा।
- जो कल हो सकता है (Defer it): दुनिया खत्म नहीं होगी।
जिस दिन आप यह फर्क करना सीख गए, आधा बोझ अपने आप कम हो जाएगा।
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2. ‘ना’ बोलने की कला सीखें
भारतीयों के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि हमें ‘ना’ बोलना नहीं सिखाया जाता। बॉस ने काम दिया—“जी सर।” सहकर्मी ने मदद मांगी—“हाँ भाई, कर दूंगा।” घर का काम—“मैं देख लूंगा।”
परिणाम? आपकी थाली में इतना खाना भर जाता है कि आप उसे खा नहीं पाते, बस उसे देखकर घबराते रहते हैं।
अगर आपके पास पहले से 4 प्रोजेक्ट हैं और बॉस 5वां लेकर आता है, तो ‘हाँ’ बोलना वफादारी नहीं, बेवकूफी है। विनम्रता से मना करना सीखें: “सर, अभी मैं प्रोजेक्ट A और B पर पूरी तरह बिजी हूँ। अगर मैं यह नया काम लेता हूँ, तो पुराने काम की क्वालिटी खराब हो सकती है। क्या हम इसे अगले हफ्ते कर सकते हैं?”
यह प्रोफेशनल तरीका है। बॉस को भी क्वालिटी चाहिए, क्वांटिटी नहीं। एक बार ‘ना’ बोलकर तो देखिये, दुनिया नहीं गिरेगी।
3. मल्टीटास्किंग
हमें लगता है कि हम ‘सुपरह्यूमन’ हैं। एक हाथ से ईमेल टाइप कर रहे हैं, दूसरे हाथ से फोन पर बात कर रहे हैं, और दिमाग में लंच का प्लान बना रहे हैं।
साइंस कहती है कि इंसानी दिमाग एक बार में एक ही काम पर फोकस कर सकता है। जब आप मल्टीटास्किंग करते हैं, तो आप दरअसल काम नहीं कर रहे होते, आप बस अपना ध्यान (Attention) बार-बार शिफ्ट कर रहे होते हैं। इससे दिमाग जल्दी थकता है और गलतियां होती हैं।
एक समय पर एक काम। जब रिपोर्ट बना रहे हों, तो ईमेल का टैब बंद कर दें। फोन को उल्टा रख दें। सिर्फ 45 मिनट के लिए एक चीज़ पर फोकस करें। आप देखेंगे कि जो काम 2 घंटे में होता था, वो 45 मिनट में हो गया। और थकान भी कम हुई।
4. अपनी ‘बैटरी’ को रिचार्ज करें
लगातार 4 घंटे कुर्सी पर बैठकर स्क्रीन घूरने से आप ‘हार्डवर्किंग’ नहीं, बल्कि ‘बुद्धू’ कहलाएंगे। आपका दिमाग एक मांसपेशी (Muscle) की तरह है। इसे भी आराम चाहिए।
हर 90 मिनट के बाद एक “Micro-Break” लें।
- 5 मिनट के लिए अपनी सीट से उठें।
- पानी पिएं।
- खिड़की के बाहर देखें (स्क्रीन को नहीं)।
- किसी दोस्त से 2 मिनट बात कर लें (काम की नहीं, फालतू बात)।
यह 5 मिनट की बर्बादी नहीं है, यह निवेश (Investment) है। जब आप वापस आएंगे, तो आपका दिमाग तरोताज़ा होगा। जो लोग लंच ब्रेक भी डेस्क पर करते हैं, वे सबसे जल्दी बर्नआउट (Burnout) का शिकार होते हैं।
5. घर का काम घर पर, ऑफिस का काम ऑफिस में
वर्क-फ्रॉम-होम ने हमारी ज़िंदगी की बाउंड्री मिटा दी है। हम रात को 10 बजे भी बॉस का व्हाट्सएप चेक करते हैं। हम संडे को भी ईमेल्स के नोटिफिकेशन देखते हैं।
इसे बंद कीजिये। अगर आप 24/7 उपलब्ध रहेंगे, तो लोग आपको 24/7 काम देंगे। एक समय तय करें—मान लीजिये शाम 7 बजे। 7 बजे के बाद, लैपटॉप बंद। ईमेल्स बंद। ऑफिस के व्हाट्सएप ग्रुप्स म्यूट।
शुरुआत में आपको डर लगेगा—“बॉस क्या सोचेगा?” लेकिन धीरे-धीरे लोगों को पता चल जाएगा कि 7 बजे के बाद आप उपलब्ध नहीं होते। वे आपको उसी हिसाब से काम देंगे। अपनी सीमाएं (Boundaries) आपको खुद खींचनी होंगी, कोई और आकर नहीं खींचेगा।
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6. बात करें
कई बार वर्क प्रेशर इसलिए होता है क्योंकि हम चुप रहते हैं। बॉस को सपना नहीं आएगा कि आप पर कितना बोझ है। उसे लग रहा है कि आप मज़े में हैं।
अगर काम वाकई बहुत ज़्यादा है, तो बॉस के साथ “वन-ऑन-वन” (1-on-1) मीटिंग करें। शिकायत न करें, डेटा दिखाएं। “सर, पिछले हफ्ते मैंने ये 5 काम किये। अभी मेरे पास ये 3 प्रोजेक्ट्स पेंडिंग हैं। मुझे लग रहा है कि मैं ओवरलोडेड हूँ और काम में गलती हो सकती है। क्या हम कुछ काम किसी और को दे सकते हैं या डेडलाइन बढ़ा सकते हैं?”
एक समझदार बॉस आपकी ईमानदारी की कद्र करेगा। और अगर बॉस समझदार नहीं है, तो फिर शायद आपको नई नौकरी ढूंढने की ज़रूरत है (क्योंकि जान है तो जहान है)।
7. अपना वेंटिलेशन सिस्टम बनाएं
कुकर में सीटी क्यों होती है? ताकि अंदर की भाप बाहर निकल सके और कुकर फटे नहीं। इंसानों को भी ‘सीटी’ की ज़रूरत होती है।
आपके पास कोई ऐसा दोस्त, पार्टनर या परिवार का सदस्य होना चाहिए जिसके सामने आप अपना सारा गुबार निकाल सकें। कोई ऐसा जो जज न करे, बस सुन ले। “यार, आज बॉस ने बहुत पकाया।” “आज क्लाइंट ने दिमाग ख़राब कर दिया।”
बोल देने से मन हल्का हो जाता है। अगर आप सारी भड़ास अंदर रखेंगे, तो वो बीपी (BP), शुगर या डिप्रेशन बनकर बाहर आएगी।
दोस्त, याद रखना… आज आप जिस काम के लिए अपनी नींद, चैन और सेहत बर्बाद कर रहे हैं, अगर कल आपको कुछ हो गया, तो आपकी कंपनी 15 दिन में आपकी जगह किसी और को रख लेगी। लेकिन आपके परिवार को आपकी जगह कोई दूसरा नहीं मिलेगा।
काम ज़रूरी है, पर काम ही सब कुछ नहीं है। तो आज थोड़ा रिलैक्स करें। एक गहरी सांस लें। प्रेशर को कुकर में ही रहने दें, दिमाग में नहीं।