ऑफिस, यानी वो जगह जहाँ हम अपने घर से भी ज़्यादा वक़्त बिताते हैं। यहाँ आपको तरह-तरह के ‘प्राणी’ मिलेंगे। कुछ ऐसे दोस्त बन जाते हैं जिनके साथ टिफिन शेयर करने में मज़ा आता है। और कुछ ऐसे होते हैं… जिनका चेहरा देखते ही “मूड ऑफ” हो जाता है।
कभी न कभी, किसी न किसी सहकर्मी (Colleague) के साथ आपकी खटपट ज़रूर हुई होगी। शायद उसने आपका क्रेडिट ले लिया हो। शायद उसने मीटिंग में आपको टोक दिया हो। या शायद उसकी शक्ल ही आपको पसंद नहीं है (होता है, हम सब इंसान हैं)।
जब ऑफिस में झगड़ा या मतभेद (Conflict) होता है, तो वहां का माहौल ‘बिग बॉस’ के घर जैसा हो जाता है। अजीब सी चुप्पी, तीखे ईमेल, और एक-दूसरे को इग्नोर करने का खेल। इसे हम “Office Cold War” कहते हैं।
दिक्कत यह है कि आप अपने पड़ोसी को बदल सकते हैं, लेकिन अपने Colleague को नहीं। आपको उसी के साथ काम करना है, उसी प्रोजेक्ट पर माथापच्ची करनी है। अगर रिश्ते खराब रहे, तो इसका असर आपके काम और आपकी मानसिक शांति (Mental Peace) दोनों पर पड़ेगा।
तो, अगर आपके और आपके डेस्क-पार्टनर के बीच “तूतू-मैंमैं” हो गई है, तो उसे सुलझाएं कैसे? प्रोफेशनल तरीके से, बिना अपनी इमेज खराब किए? आइये समझते हैं दफ्तर के झगड़ों को हैंडल करने का स्मार्ट तरीका।

1. ईमेल युद्ध बंद करें
यह सबसे बड़ी गलती है जो हम गुस्से में करते हैं। उसने एक रूड (Rude) ईमेल भेजा। आपने उससे भी ज़्यादा रूड रिप्लाई किया। फिर उसने आपको और बॉस को CC में रखकर एक और बम फोड़ा। बधाई हो! आपने राई का पहाड़ बना दिया है।
नियम: कभी भी टाइप करके झगड़ा न सुलझाएं। टेक्स्ट या ईमेल में “Tone” (लहजा) समझ नहीं आता। हो सकता है उसने जल्दी में लिखा हो—“Send me the report.” और आपने इसे पढ़ा—“SEND ME THE REPORT NOW!” (चिल्लाते हुए)।
जब भी लगे कि बात बिगड़ रही है, कीबोर्ड से हाथ हटाएं। उठें, उसकी डेस्क पर जाएं और कहें—“क्या हम 2 मिनट बात कर सकते हैं?” आमने-सामने बैठकर 90% गलतफहमियां दूर हो जाती हैं। जो इंसान ईमेल पर शेर बनता है, वो अक्सर आमने-सामने भीगी बिल्ली या कम से कम तमीजदार इंसान बन जाता है।
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2. गुस्सा थूक दें
जब खून खौल रहा हो, उस वक़्त लिया गया हर फैसला गलत होता है। अगर किसी Colleague ने मीटिंग में आपकी बेइज्जती कर दी, तो तुरंत पलटवार करने का मन करता है।
रुक जाइए। गहरी सांस लें। पानी पिएं। हो सके तो वॉशरूम का एक चक्कर लगा आएं। मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि गुस्से का पीक (Peak) सिर्फ 20 मिनट रहता है। अगर आपने वो 20 मिनट निकाल लिए बिना कुछ बोले, तो आप बाद में बहुत पछताने से बच जाएंगे।
“रिएक्ट” (React) मत करो, “रिस्पॉन्ड” (Respond) करो। रिएक्शन भावनाओं से निकलता है, रिस्पॉन्स दिमाग से। 24 घंटे का इंतज़ार करें। अगले दिन आपको वो बात उतनी बड़ी नहीं लगेगी जितनी उस वक़्त लग रही थी।
3. ‘व्यक्ति’ से नहीं, ‘मुद्दे’ से लड़ें
झगड़े दो तरह के होते हैं:
- Professional: “मुझे लगता है यह आईडिया काम नहीं करेगा।”
- Personal: “तुम हमेशा बेवकूफों वाली बातें करते हो।”
दिक्कत तब शुरू होती है जब हम पहले वाले को दूसरा बना देते हैं। जब आप बात करने जाएं, तो “तुम” (You) शब्द का इस्तेमाल कम करें और “मैं” (I) का ज्यादा।
- गलत तरीका: “तुमने मुझे रिपोर्ट टाइम पर नहीं दी, तुम बहुत गैर-जिम्मेदार हो।” (यह सीधा हमला है)।
- सही तरीका: “मुझे रिपोर्ट नहीं मिली, इसलिए मैं क्लाइंट को जवाब नहीं दे पाया। इससे मुझे बहुत स्ट्रेस हुआ।”
जब आप अपनी परेशानी बताते हैं, तो सामने वाला डिफेंसिव (Defensive) नहीं होता। मुद्दे पर बात करें—काम कहाँ अटका? प्रोसेस क्या था? उस इंसान के चरित्र (Character) पर उंगली न उठाएं।
4. गॉसिप गैंग से दूर रहें
यह बहुत लुभावना होता है। झगड़ा होते ही हम सीधे अपने ‘ऑफिस बेस्टी’ के पास जाते हैं और भड़ास निकालते हैं—“यार, वो राहुल पागल है क्या? खुद को समझता क्या है?”
यह आपको दो मिनट का सुकून देगा, लेकिन लॉन्ग टर्म में नुकसान करेगा। ऑफिस की दीवारें बहुत पतली होती हैं। आप जिसे अपना दोस्त मानकर बता रहे हैं, हो सकता है वो राहुल के साथ लंच करता हो। अगर आपकी बातें घूम-फिर कर उस तक पहुंचीं (और यकीन मानिए, वो पहुंचेंगी), तो छोटा सा मतभेद ‘दुश्मनी’ में बदल जाएगा।
अगर भड़ास निकालनी ही है, तो ऑफिस के बाहर अपने किसी ऐसे दोस्त या परिवार वाले से निकालें जिसका आपके ऑफिस से कोई लेना-देना न हो। ऑफिस के अंदर “स्विट्जरलैंड” (न्यूट्रल) बने रहें।
5. दूसरे का नज़रिया भी देखें
हो सकता है आप सही हों। लेकिन हो सकता है कि वो भी गलत न हो। शायद उस Colleague पर उसके बॉस का बहुत प्रेशर हो। शायद उसके घर में कोई दिक्कत चल रही हो। शायद उसे डर हो कि अगर यह प्रोजेक्ट फेल हुआ तो उसकी नौकरी चली जाएगी।
थोड़ी सी सहानुभूति (Empathy) जादू का काम करती है। अगली बार जब कोई चिड़चिड़ा हो, तो लड़ने के बजाय पूछें—“Is everything okay? You seem stressed today.” (क्या सब ठीक है? तुम आज परेशान लग रहे हो।)
कई बार सामने वाला सिर्फ यह चाहता है कि कोई उसकी बात सुन ले। जैसे ही आप नरमी दिखाते हैं, सामने वाले का गुस्सा पिघल जाता है।
6. ‘सॉरी’ बोलने से कोई छोटा नहीं होता
कभी-कभी गलती हमारी भी होती है। (हाँ, मान लो!) हो सकता है आपने डेडलाइन मिस की हो या मज़ाक में कुछ ऐसा बोल दिया हो जो उसे चुभ गया।
अगर गलती आपकी है, तो ईगो (Ego) को साइड में रखें और माफी मांग लें। एक सीधा और ईमानदार—“I am sorry, मेरी वजह से गड़बड़ हुई,” बड़े से बड़े झगड़े को खत्म कर सकता है। माफी मांगना कमजोरी नहीं, बल्कि कॉन्फिडेंस की निशानी है। यह दिखाता है कि आप अपनी गलती मानने की हिम्मत रखते हैं।
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7. बॉस को कब शामिल करें?
हर छोटी बात पर बॉस के पास रोते हुए जाना स्कूल के बच्चे जैसा लगता है—“मैम, देखो इसने मेरी पेंसिल ले ली!” बॉस को वो लोग पसंद नहीं जो उनके लिए और सिरदर्दी लेकर आएं।
बॉस के पास तभी जाएं जब:
- आपने बात करके सुलझाने की कोशिश की, लेकिन बात नहीं बनी।
- सामने वाला बदतमीजी (Abuse) या हैरेसमेंट (Harassment) कर रहा है।
- काम का बहुत बड़ा नुकसान हो रहा है।
और जब बॉस के पास जाएं, तो सिर्फ शिकायत न करें। समाधान (Solution) भी ले जाएं। “सर, राहुल और मेरे बीच को-ऑर्डिनेशन में दिक्कत आ रही है। मैंने बात की थी पर हल नहीं निकला। मेरा सुझाव है कि हम वीकली मीटिंग करें ताकि कम्युनिकेशन गैप न हो।”
8. सहमत न होने पर सहमत हों
अंत में, यह समझना ज़रूरी है कि ऑफिस में आप दोस्त बनाने नहीं, काम करने आए हैं। ज़रूरी नहीं कि हर कोई आपको पसंद करे। ज़रूरी नहीं कि आप हर किसी को पसंद करें।
कभी-कभी सुलह नहीं हो पाती। विचारों का अंतर बना रहता है। ऐसे में “Agree to Disagree” का फॉर्मूला अपनाएं। “ठीक है, आपका तरीका अलग है, मेरा अलग है। चलो बस इतना तय करते हैं कि काम कैसे पूरा होगा।”
प्रोफेशनल रिश्ता बनाए रखें। “हाय-हेलो” करें, काम की बात करें और आगे बढ़ें। दिल पर लेने की ज़रूरत नहीं है।
ऑफिस के झगड़े ट्रैफिक जाम की तरह होते हैं—इरिटेटिंग, लेकिन सफर का हिस्सा। आप गाड़ी छोड़कर भाग नहीं सकते। आपको धैर्य रखना होगा, रास्ता निकालना होगा और आगे बढ़ना होगा।
याद रखें, आपकी Reputation (साख) इस बात से नहीं बनती कि आपने कितना अच्छा काम किया, बल्कि इस बात से बनती है कि आपने मुश्किल हालात में खुद को कैसे संभाला।
तो अगली बार जब कोई Colleague दिमाग की दही करे, तो मुस्कुराएं, गहरी सांस लें और सोचें—“यह सिर्फ एक जॉब है, मेरी पूरी ज़िंदगी नहीं।”