भारत में अगर कोई पेशा है जिसे भगवान का दर्जा दिया गया है, तो वह डॉक्टर का है। और अगर वह डॉक्टर ‘सरकारी’ हो, तो सोने पे सुहागा। गाँव के पीएचसी (PHC) से लेकर दिल्ली के एम्स (AIIMS) तक, सरकारी डॉक्टर की एक अलग ही धाक होती है। अच्छी सैलरी, जॉब सिक्योरिटी, और सबसे बड़ी बात—उन गरीबों का इलाज करने का मौका जिनके पास प्राइवेट अस्पताल की सीढ़ियां चढ़ने के पैसे नहीं हैं।
लेकिन दोस्तों, गले में स्टेथोस्कोप (Stethoscope) लटकाना और नाम के आगे ‘Dr.’ लगवाना आसान नहीं है। यह एक तपस्या है। लोग कहते हैं कि “डॉक्टर बनने के लिए पैसा चाहिए।” यह आधा सच है। सरकारी डॉक्टर बनने के लिए पैसा नहीं, ‘दिमाग’ और ‘ज़िद’ चाहिए।
अगर आप या आपके घर का कोई बच्चा 2026 में इस सपने को देख रहा है, तो यहाँ पूरा रोडमैप है—बिना किसी लाग-लपेट के।

1. 11वीं और 12वीं
डॉक्टर बनने की पहली शर्त है—बायोलॉजी (Biology) से प्यार। अगर आपको खून देखकर चक्कर आते हैं, या मेंढक काटने में डर लगता है, तो अभी यू-टर्न ले लीजिये।
- स्ट्रीम: आपको 10वीं के बाद Science Stream (PCB) लेनी होगी। यानी फिजिक्स, केमिस्ट्री और बायोलॉजी।
- सच्चाई: बहुत से बच्चे बायो तो रट लेते हैं, लेकिन फिजिक्स (Physics) में लटक जाते हैं। याद रखिये, डॉक्टर बनने का रास्ता फिजिक्स की न्यूमेरिकल समस्याओं से होकर गुज़रता है। इसे हल्के में मत लेना।
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2. NEET
भारत में डॉक्टर बनने का सिर्फ एक ही दरवाजा है—NEET (National Eligibility cum Entrance Test)। चाहे आपको सरकारी कॉलेज चाहिए या प्राइवेट, आपको नीट के शेर से लड़ना ही पड़ेगा।
सरकारी कॉलेज क्यों ज़रूरी है? यहाँ खेल ‘फीस’ का है।
- प्राइवेट कॉलेज: एमबीबीएस की फीस 50 लाख से 1 करोड़ रुपये तक हो सकती है। (मिडिल क्लास की पहुँच से बाहर)।
- सरकारी कॉलेज: फीस सालाना 5 हज़ार से 50 हज़ार रुपये। (लगभग मुफ्त)।
यही कारण है कि 25 लाख बच्चे कुछ हज़ार सीटों के लिए लड़ते हैं। अगर आपको सरकारी डॉक्टर बनना है, तो आपको NEET में 650+ मार्क्स (720 में से) लाने होंगे।
तैयारी का मंत्र: कोचिंग वाले आपको हज़ारों मॉड्यूल देंगे। उन्हें रद्दी में बेच दें। सिर्फ और सिर्फ NCERT (11वीं और 12वीं) को अपनी गीता, बाइबिल और कुरान बना लें। नीट का 90% पेपर, खासकर बायो और केमिस्ट्री, सीधा NCERT की लाइनों से आता है।
3. MBBS 5.5 साल
नीट निकल गया? बधाई हो! आप आधा डॉक्टर बन गए। अब शुरू होता है MBBS का सफर।
यह फिल्मों जैसा नहीं होता। यहाँ आपको ‘मुन्ना भाई’ वाली मस्ती नहीं, मोटी-मोटी किताबें मिलेंगी।
- पढ़ाई: आपको इंसान के शरीर का एक-एक पुर्जा समझना होगा।
- Anatomy Hall: पहले साल में आपको असली मृत शरीर (Cadaver) पर चीर-फाड़ सीखनी होगी। बहुतों को उल्टी आती है, लेकिन आदत पड़ जाती है।
- Ward Duty: तीसरे साल से आपकी ड्यूटी मरीजों के बीच लगने लगती है।
साढ़े चार साल की पढ़ाई के बाद, आपको 1 साल की Rotatory Internship करनी होती है। यही वो समय है जब आप असली ‘सरकारी डॉक्टर’ वाली फीलिंग लेते हैं। 36-36 घंटे की शिफ्ट, भीड़, खून-पसीना—यह आपको मज़बूत बनाता है।
4. MBBS तो हो गया अब सरकारी नौकरी कैसे मिलेगी?
एमबीबीएस की डिग्री हाथ में आ गई। अब आप डॉक्टर हैं। लेकिन ‘सरकारी नौकरी’ अभी भी पक्की नहीं है। इसके लिए आपके पास तीन रास्ते हैं:
(A) Medical Officer Exam
हर राज्य का लोक सेवा आयोग (State PSC) समय-समय पर डॉक्टरों की भर्ती निकालता है। जैसे: UPPSC Medical Officer, BPSC MO, या MPPSC MO।
- इसमें एक लिखित परीक्षा होती है और इंटरव्यू होता है।
- अगर आप सेलेक्ट हो गए, तो आपको सीधे PHC (Primary Health Centre) या CHC में तैनात किया जाता है। आप Class-1 Gazetted Officer बन जाते हैं।
(B) बॉन्ड सर्विस
यह सबसे आसान रास्ता है। ज्यादातर राज्यों में सरकारी कॉलेज से एमबीबीएस करने वालों के लिए ‘बॉन्ड’ होता है। सरकार कहती है: “हमने तुम्हें सस्ते में पढ़ाया, अब तुम्हें 2 साल गाँव में सेवा करनी होगी।” यह अनिवार्य (Mandatory) होता है। इन 2 सालों में आपको पूरी सरकारी सैलरी मिलती है। बहुत से डॉक्टर इसी बॉन्ड सर्विस के दौरान परमानेंट होने के रास्ते ढूंढ लेते हैं।
(C) National Health Mission (NHM)
यह संविदा (Contract) वाली नौकरी है। सरकार NHM के तहत हर जिले में डॉक्टरों की वैकेंसी निकालती है। इसमें एग्जाम नहीं होता, अक्सर सिर्फ इंटरव्यू (“Walk-in-Interview”) से सिलेक्शन हो जाता है। सैलरी अच्छी होती है, लेकिन यह पक्की नौकरी नहीं होती।
5. स्पेशलिस्ट बनना
सच कहूँ तो, आज के ज़माने में सिर्फ एमबीबीएस डॉक्टर की वैल्यू थोड़ी कम हो गई है। लोग स्पेशलिस्ट को ढूंढते हैं।
- दिल का डॉक्टर (Cardiologist)
- हड्डी का डॉक्टर (Orthopedic)
- बच्चों का डॉक्टर (Pediatrician)
इसके लिए आपको फिर से एक एग्जाम देना होगा—NEET PG। यह नीट-यूजी से भी ज्यादा कठिन है। इसे पास करके आप 3 साल की एमडी (MD) या एमएस (MS) करते हैं। सरकारी अस्पतालों में ‘सीनियर रेजिडेंट’ और ‘प्रोफेसर’ बनने के लिए पीजी ज़रूरी है।
6. सैलरी और लाइफस्टाइल
मोटिवेशन के लिए जेब भी भारी होनी चाहिए।
- Medical Officer (MBBS): शुरुआत ₹60,000 से ₹85,000 (राज्य के हिसाब से)।
- Specialist/Professor: ₹1.5 लाख से ₹2.5 लाख महीना।
सुविधाएं:
- रहने के लिए सरकारी आवास।
- समाज में इज्जत (थानेदार भी साहब कहकर बुलाता है)।
- जॉब सिक्योरिटी (सरकार डॉक्टर को कभी नहीं निकालती, क्योंकि डॉक्टरों की बहुत कमी है)।
चुनौतियां (The Dark Side):
- गाँव की पोस्टिंग: शुरुआत में आपको ऐसे गाँव में भेजा जा सकता है जहाँ बिजली भी ठीक से नहीं आती।
- भीड़ और गुस्सा: सरकारी अस्पताल में मरीज़ों की भीड़ होती है। कभी-कभी मरीज़ के तीमारदार हाथापाई पर उतर आते हैं।
- संसाधन की कमी: कभी दवाई नहीं होगी, कभी मशीन खराब होगी। आपको ‘जुगाड़’ से इलाज करना होगा।
सरकारी डॉक्टर बनना सिर्फ करियर बनाना नहीं है, यह एक जिम्मेदारी उठाना है। जब एक गरीब बूढ़ी मां, जिसका इलाज कोई प्राइवेट अस्पताल नहीं कर रहा था, आपके इलाज से ठीक होकर आपके सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद देती है—वो फीलिंग करोड़ों के पैकेज से बड़ी होती है।
रास्ता लंबा है। 11वीं से लेकर नौकरी लगने तक कम से कम 8-9 साल लग जाते हैं। आपके स्कूल के दोस्त शायद आपसे पहले पैसे कमाने लगेंगे, इंजीनियर बनकर कार खरीद लेंगे। लेकिन जब आप डॉक्टर बनकर लौटेंगे, तो आपकी जो ‘रिस्पेक्ट’ होगी, उसका कोई मुकाबला नहीं होगा।